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गो सेवा से रोजगार एवं स्वास्थ्य

शहरों में शुद्ध दूध मिलना मुश्किल होना है।मिलावट में क्या क्या मिलेगा,गंदा पानी,निरमा, केमिकल ...न जाने क्या क्या???
शहरी कालोनियों में भी गाय रखने का आदेश जारी करें। कुछ नहीं तो हर तीसरा घर गाय रखता तो अपने गेट पर नाद की व्यवस्था करें।एक इम्प्लायमेट होगा।२-३घरो को दूध बेचेगा। इनवायरमेंट ठीक होगा।गोपालन की परम्परा भी मजबूत होगी।
गो मूत्र,गोबर को उठाने स्वीपर ,जो रोज कुडे की गाड़ी लेकर आते हैं।उठाये। उन्हें पर 100/पर माह हर घर से देने का आदेश हो।
इससे एक पाज़िटिव रुख समाज में आयेगा।
कुत्ते रखने और उनकी शौच आदि घर में ही कराये, नहीं तो फाईन देनी होगी। HIG घरों में गमले रखना अनिवार्य होगा।10घरों में एक माली रखें।300/प्रति घर कम से कम देय होगा। भारतीय परम्परागत परिवेश से हम जागृत होंगे।इससे हम रोजगार बढा पायेगें।
जय भारत


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बेटियां हमारी संस्कृति संरक्षिता हैं।

 २०सदी वाली आधी आबादी ने आर्थिक अभाव को झेला।सुनंदा, सुघड़, संस्कारित , पढ़ी लिखी होने के बाद भी परिवार में उन्हें एक सम्मानित दर्जा नहीं मिला।जब कभी किसी को कुछ देना हो तो डरते ही कहीं जा सकती।       एवज में एक सुदृढ़ पीढ़ी की सोच बनी।‌बेटियां भी  पैसा कमाये और जीवन जीये। लड़की को लड़का बनाने में लग गए। उच्च शिक्षित,ऊंचे पद, अकेले आना जाना,पोशाक, परिवेश सब वही बेटों वाले..... अब घर कैसे चलेगा???? एक बड़ा प्रश्न????? अपनी सोच, संविधान के नये विधान ने शादी, बच्चे सब बोझ लगने लगे। सहजीवन शैली में साथ रहे, फिर जैसे तैसे शादी की तो ४० साल में पहली संतान हुई। तो क्या कर लेंगे? खुद के माता-पिता, अपनी ढलती उम्र,नादान बच्चे को संभाल पायेंगे? नहीं न! लड़की को लड़की का ही गौरव बनने दें।पति अपने वेतन से हर माह कुछ एमाउनंट उसके खाते में डालें।उसको ससम्मान गृहणी का दर्जा दें। गर्व‌ करे कि हमारी बेटी ससुराल/पति के साथ है। खुश  है।यह प्रयास दोनों ओर से करना होगा।तभी हम अपनी पीढ़ी, संस्कृति को बचा पायेंगे।

कोर्ट नै बराबरी का अधिकार एवं कर्तव्य देकर हमको सम्मान दिया है। इंसानियत को‌ पहचाने।

हम बेहद शुक्रगुजार हैं कि हमें अपने माता-पिता के साथ रहने का ,रखने का तथा उस घर को अपना समझने का आत्मविश्वास तो आया है। कोर्ट ने यह सम्मान हमें दिया है।आभार आज की स्त्री पढ़ाई, नौकरी के दबाव में व्यक्ति गत जीवन के रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने से बच रही,उन रिश्तों की अपेक्षा ने अब विराम लगाने की सीमा खींच दी है।अब मन उस चला है।करते करते हाथ की लकीरें घिस गई पर दो मीठे बोल को कान तरह गये। एक मेरे पड़ोस में थीं। बड़े घर की इकलौती बेटी,सुंदर,टोकरे भर दहेज ,इतना कि उनके घर में रखने की जगह नहीं बची।वो सारा काम, मृदभाषी ।पर.... परिवार के लिए जीवन समर्पित कर दिया।12साल उस परिवार की बेटी को रखा।सुबह 6बजे टिफिन बनाकर दिया। तमाम ढक्कन,तोपन लगाकर अपनी जरूरतें, बच्चों के शौक काटकर शादी की।जमीन,घर,मरना जीना,भाई की बेटियों की शादी,बेटे की फीस,बहन के साथ ....।     पर जो बेटी 12साल रहीं वो किसी बच्चे की शादी में झांकने नहीं आई।आज तक किसी ने कभी बच्चों को एक झबला नहीं दिया।एक बाबूजी के नाम प्लांट लिया ,उनके मरते ही बड़े भाई ने मां से अपने नाम दान करना लिया। मां बिस्तर पर है तो यही है...

कद

 कद गगन ने‌ धरती से पूछा क्यों सहती इतना बोझ ? एक मूक स्वर  मातृत्व मेरा सुख है. तुम दूर क्यों दिखते  करीब आओ न  गगन सोचता रहा  फिर रिक्तता से एक आवाज आई  तेरे मातृत्व के समक्ष मेरा बौनापन।