हम बेहद शुक्रगुजार हैं कि हमें अपने माता-पिता के साथ रहने का ,रखने का तथा उस घर को अपना समझने का आत्मविश्वास तो आया है। कोर्ट ने यह सम्मान हमें दिया है।आभार
आज की स्त्री पढ़ाई, नौकरी के दबाव में व्यक्ति गत जीवन के रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने से बच रही,उन रिश्तों की अपेक्षा ने अब विराम लगाने की सीमा खींच दी है।अब मन उस चला है।करते करते हाथ की लकीरें घिस गई पर दो मीठे बोल को कान तरह गये।
एक मेरे पड़ोस में थीं। बड़े घर की इकलौती बेटी,सुंदर,टोकरे भर दहेज ,इतना कि उनके घर में रखने की जगह नहीं बची।वो सारा काम, मृदभाषी ।पर.... परिवार के लिए जीवन समर्पित कर दिया।12साल उस परिवार की बेटी को रखा।सुबह 6बजे टिफिन बनाकर दिया। तमाम ढक्कन,तोपन लगाकर अपनी जरूरतें, बच्चों के शौक काटकर शादी की।जमीन,घर,मरना जीना,भाई की बेटियों की शादी,बेटे की फीस,बहन के साथ ....।
पर जो बेटी 12साल रहीं वो किसी बच्चे की शादी में झांकने नहीं आई।आज तक किसी ने कभी बच्चों को एक झबला नहीं दिया।एक बाबूजी के नाम प्लांट लिया ,उनके मरते ही बड़े भाई ने मां से अपने नाम दान करना लिया। मां बिस्तर पर है तो यही है।
क्या परिवार में आप सकुशल हैं?ऐसा परिवार आप चाहेंगे।बेहतर है अकेले रहे। समाज के लिए जीयें।
एक मेरे यहां लड़का है।२०साल से साथ हैं।उसके लिए एक छोटी सी मकान बनवा दी।उसके बच्चे स्कूल जाने लगे।
वह हम लोगों के साथ हमेशा खड़ा रहता है। बीमार पड़ने पर पुरे दिन ,हास्पिटल,घर.....
जब ठीक होने लगो तो मां के मंदिर में दीपक जलाकर खुश होने लगेगा।
इसी अपने को जीवंत करके वसुधैव कुटुंबकम् को साधें, तनावमुक्त रहें।
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