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बेटियां हमारी संस्कृति संरक्षिता हैं।

 २०सदी वाली आधी आबादी ने आर्थिक अभाव को झेला।सुनंदा, सुघड़, संस्कारित , पढ़ी लिखी होने के बाद भी परिवार में उन्हें एक सम्मानित दर्जा नहीं मिला।जब कभी किसी को कुछ देना हो तो डरते ही कहीं जा सकती।

      एवज में एक सुदृढ़ पीढ़ी की सोच बनी।‌बेटियां भी 

पैसा कमाये और जीवन जीये। लड़की को लड़का बनाने में लग गए। उच्च शिक्षित,ऊंचे पद, अकेले आना जाना,पोशाक, परिवेश सब वही बेटों वाले.....

अब घर कैसे चलेगा????

एक बड़ा प्रश्न?????

अपनी सोच, संविधान के नये विधान ने शादी, बच्चे सब बोझ लगने लगे। सहजीवन शैली में साथ रहे, फिर जैसे तैसे शादी की तो ४० साल में पहली संतान हुई।

तो क्या कर लेंगे? खुद के माता-पिता, अपनी ढलती उम्र,नादान बच्चे को संभाल पायेंगे?

नहीं न! लड़की को लड़की का ही गौरव बनने दें।पति अपने वेतन से हर माह कुछ एमाउनंट उसके खाते में डालें।उसको ससम्मान गृहणी का दर्जा दें।

गर्व‌ करे कि हमारी बेटी ससुराल/पति के साथ है। खुश 

है।यह प्रयास दोनों ओर से करना होगा।तभी हम अपनी पीढ़ी, संस्कृति को बचा पायेंगे।




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